Tota ke Bacche तोता के बच्चे

तोता के बच्चे

चार दोस्त थे। चारों एक ही गांव के थे। उन चारों दोस्तों का नाम था- पिंकू, मिंटू, चिंटू और गोलू। चारों दोस्त एक दिन अपने ही गांव के बगीचे में खेल रहे थे। खेलते खेलते उनको पेड़ में एक खोखला दिखा। खोखले में एक तोता अपने बच्चों के साथ रह रहा था। बच्चों की नजर उस तोते पर पड़ गई।

सभी बच्चे खुशी से चिल्लाए- “अरे देखो-देखो तोता का घोंसला और उसके छोटे-छोटे बच्चे।” सब एक साथ चिल्लाए, “चलो-चलो तोता का बच्चा पकड़ते हैं।” सभी ने हां में हां मिलाया और खुशी से तोते का बच्चा पकड़ने के लिए तैयार हो गए।

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पिंकू पेड़ पर चढ़ने में सबसे ज्यादा माहिर था। वह पेड़ पर झट से चढ़ गया और पेड़ के खोखल में से तोते के बच्चे निकालने लगा। खोखल में तोते के चार बच्चे थे। चारों दोस्तों ने एक-एक बच्चा ले लिया। खुशी-खुशी तोते के बच्चे के साथ चारो दोस्त अपने-अपने घर गए। सब ने तोता का बच्चा अपने मम्मी और पापा को दिखाया। सब बहुत खुश थे। सभी दोस्त अपने मम्मी-पापा से बाजार से पिजड़ा मंगवाए और बड़ी खुशी से तोते के बच्चे को उसमें बिठाए। तोते के बच्चे के खाने के लिए ढेर सारा खाने का सामान इकठ्ठा किए। तोते के बच्चे के लिए दूध, फल, लाल मिर्च ले आए। तोते के बच्चे बहुत छोटे थे। अभी उनके ठीक से पंख भी नहीं आए थे।

चिंटू के पापा ने कहा बेटा हमें पक्षियों को पिंजरे में बंद नहीं करना चाहिए। इनको दुख होता है। यह बच्चा अपने परिवार से बिछड़ गया हैं। तोता मन ही मन रोता होगा और यह बच्चा भी। इससे हमें पाप लगता है। हमें ऐसा नहीं करना चाहिए। चारों दोस्तों के माता-पिता ने ऐसा ही समझाया, लेकिन अब किया भी क्या जा सकता था। काफी देर हो चुकी थी। दस दिन बीत गए थे। तोता भी अब अपने खोखल में आना छोड़ दिया था। बच्चे को छोड़े तो कहां छोड़े। यदि बाहर छोड़े तो कौआ मार देगा और अपने पास रखें तो पाप लगेगा।

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अब बच्चे करें भी तो क्या करें। किसी तरह से बच्चे खुशी-खुशी तोते के बच्चे को पालने लगे, खिलाने-पिलाने लगे। सबने अपने-अपने तोते का नाम भी रख दिया था। तोते से मिट्ठू-मिट्ठू, राम-राम, पट्टू-पट्टू इत्यादि शब्द बोलने का अभ्यास करवाने लगे।तोते के बच्चे भी अब धीरे-धीरे बोलने लगे थे। तोते का बच्चा भी अब घुल-मिल गया था।

सब कुछ सही चल रहा था। चारो दोस्त कभी-कभी पिजड़े को अपने घर के बाहर छज्जे में लटका देते थे। जब तोते का बच्चा बोलता था तो उसकी आवाज को सुनकर के ढेर सारे तोते आस-पास के पेड़ों पर आ जाते और आवाज लगाने लगते। इस तरह पिजड़े में तोते के बच्चे से और पेंड वाले तोतों से कुछ बातचीत हो जाती थी। धीरे-धीरे करके बाहर के तोते जो पेड़ पर बैठते थे, आकर पिजड़े पर भी बैठने लगे। ऐसा देखने में और भी अच्छा लगने लगा। बच्चों के घर वाले और बच्चे बहुत खुश होते थे।

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अब दो महीने बीत गए थे। बाहर वाले तोते आते रहे। पिंकू, मिंटू और गोलू के तोते पिजड़ा खुला पाकर उड़ गए। अब बचा चिंटू का तोता, चिंटू बहुत ही सावधानी से तोते के बच्चे को खाना खिलाता और फिर पिजड़ा बंद कर देता था। तोते का बच्चा अब तोता बन गया था। वह भी उड़ना सीख गया था। कभी-कभी चिंटू उस तोते को अपने कमरे की खिड़की और दरवाजा बंद करके उड़ने के लिए छोड़ देता था। तोता का बच्चा भी खुला पाकर खूब उड़ता था। खूब मस्ती करता था।

इस तरह से चिंटू में और तोते में काफी लगाव हो गया था। चिंटू अपने तोते को प्यार से मिट्ठू बुलाता था। अब चारों दोस्तों में सिर्फ चिंटू का तोता ही बचा था। अब तो मिट्ठू राम राम भी बोलने लगा था। चिंटू मिट्ठू को छोड़ना नही चाहता था। चिंटू के माता-पिता भी चिंटू को खूब समझाते थे कि बेटा देखो इसके साथी तोते आते हैं, पिजड़े पर बैठते हैं, वे चाहते हैं कि इस तोते को भी उड़ा ले जाएं। मिठ्ठू भी खूब छटपटाता है। वह भी उनके साथ उड़ जाना चाहता है। चिंटू के पिता ने समझाया कि तुम मेरे बच्चे हो, तुम्हें कोई उठा ले जाए, तुम्हें ऐसे ही बंद कर दे तो मेरे ऊपर और तुम्हारे ऊपर क्या बीतेगी, जरा सोचो।

चिंटू को बात धीरे-धीरे समझ में आने लगी। चिंटू कभी-कभी पिजड़े को छत पर रख देता था। उसके साथी तोते आते और उसको घेर करके मिठ्ठू से गुफ़्तगू करते। एक दिन चिंटू अपने पिता से बोला, “पिताजी मैं मिठ्ठू को छोड़ना चाहता हूँ। सबने कह दिया हां बेटा छोड़ दो, अच्छी बात है। चिंटू पिजड़े को छत पर रख के पिजड़े का दरवाजा खोल दिया। उसके साथी तोते आए। मिठ्ठू पिजड़े से बाहर निकला, इधर-उधर देखा। चिंटू को भी देखा। जैसे कुछ कहना चाहता हो। कुछ ही पल में मिठ्ठू अपने माता-पिता के साथ उड़ गया। टेढ़ी-मेढ़ी, तिरछी-मिरछी उड़ते हुए सारे तोते कहीं चले गए।

इस तरह से अब मिट्ठू आजाद था अपने साथियों के साथ उड़ता था। सारे तोते अभी भी घर के आसपास के पेड़ों पर आते थे। उसमें मिट्ठू भी रहता था। चिंटू की आवाज को सुनकर मिठ्ठू भी बोलता था। दोनों आपस में बात कर लेते थे। चिंटू मिठ्ठू को भूल नही पा रहा था। कभी-कभी वह भावुक हो जाता था। लेकिन खुश था क्योंकि मिठ्ठू को छोड़कर उसने नेक काम किया था। मिठ्ठू अपने माता पिता के साथ मिलकर बहुत खुश था। अब वह सारी दुनिया देख सकता था। कुछ भी खा सकता था, कहीं भी जा सकता था।

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तो बच्चों, हमें किसी पक्षी को पिंजरे में बंद नहीं करना चाहिए। हमारी तरह उनकी भी दुनिया है। वे भी आजादी पसंद करते हैं। हमें किसी की आजादी नही छीननी चाहिए। पशु-पक्षियों सबके साथ प्रेम भावना से रहना चाहिए।

दिनेश कुमार भूषण

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